इसी तरह कारों में प्रेशर हॉर्न का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे लोगों की भक्ति भी DJ वाली होती है. वो DJ वाले बाबू की मदद से पूरी दुनिया को ज़बरदस्ती कानफोड़ू भजन सुनवाना चाहते हैं. अब तो भजनों को भी तेज़ आवाज़ में Remix करके गाया जाने लगा है. लोग तेज़ आवाज़ में लाउडस्पीकर इसलिए बजाते हैं ताकि दूसरों को उनकी ताकत का एहसास हो. नोट करने वाली बात ये है कि शोर को ताकत और रसूख दिखाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. सही मायने में प्रदूषण की शुरुआत, आम लोगों के दिमाग से होती है.
आपके कई बार ये नोट किया होगा कि भारत में ट्रैफिक Signal के Green होते ही, वाहन चालक अपना धैर्य खो देते हैं और Horn बजाना शुरू कर देते हैं. कुछ ड्राइवर्स तो Signal के Green होने का इंतज़ार भी नहीं करते...वो धीरे धीरे आगे बढ़ने की कोशिश में Horn बजाते रहते हैं. आगे बढ़ने की ऐसी ही मानसिकता, पटाखे जलाते हुए भी दिखाई देती है. लोग दीवाली मनाने के बजाए, अपने आसपास के लोगों से मुकाबला करने लगते हैं. और इस मुकाबले में जीत उसकी होती है. जिसके पटाखे ज़्यादा शोर मचाते हैं.
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जो लोग इस तरह शोर मचाकर दूसरों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं.उन्हें ऐसा लगता है कि उनकी कुंठा और गुस्सा कम हो जाएगा, लेकिन इस मानसिकता की वजह से वो शोर मचाने और दिखावा करने के मुकाबले में फंसते चले जाते हैं. चाहे प्रेशर हॉर्न का इस्तेमाल हो, दूसरों को बहरा करने वाला संगीत हो या आधी रात को DJ के ज़रिए दूसरों को ज़बरदस्ती भजन सुनवाने की मानसिकता हो. सबमें मन की कुंठाएं साफ़ नज़र आती हैं. शोर के ज़रिए अपनी ताकत दिखाना भी एक प्रदूषण है. और इसकी शुरुआत आपके दिमाग और आपके विचारों से होती है.
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