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कैंसर रोगियों के लिए खुशखबरी, वैज्ञानिकों ने इलाज के लिए निकाला ये तरीका

वॉशिंगटन:  वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कृत्रिम मेधा तंत्र(एएल) विकसित किया है जो सीटी स्कैन में फेफड़े के कैंसर के धब्बों को सटीकता से पहचान लेते हैं जिन्हें कई बार रेडियोलॉजिस्टों को पहचानने में कठिनाई आती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह एएल तंत्र 95 प्रतिशत तक सटीक है वहीं इंसान की आंखे 65 प्रतिशत तक ही इन मामलों में सटीक आकलन कर पाती हैं. अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ सेन्ट्रल फ्लोरिडा में कार्यरत रोडने लालोंडे ने कहा, ‘‘हमने अपना तंत्र विकसित करने के लिए मस्तिष्क को मॉडल के तौर पर इस्तेमाल किया’’ यह प्रक्रिया उस अल्गोरिदम के ही समान है जिसका इस्तेमाल चेहरा पहचानने वाला सॉफ्टवेयर करता है. यह एक खास पैटर्न का मैच मिलाने के लिए हजारों चेहरों को स्कैन करता है. शोधकर्ताओं ने ट्यूमर की पहचान करने के लिए बनाए गए कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर को एक हजार से ज्यादा सीटी स्कैन दिखाए. कम्प्यूटर को दक्ष बनाने के लिए उन्होंने उसे सीटी स्कैन में नजर आने वाले ऊतकों, तंत्रिकाओं, तथा अन्य संरचनाओं को नजरअंदाज कर फेफड़े के ऊतकों का अध्ययन करना सिखाया.

वैज्ञानिकों ने की खोजी ये तकनीक, कैंसर के रोगियों को मिलेगी सुविधा

  परीक्षण के दौरान 50 मरीजों पर इसका प्रयोग किया गया.(फाइल फोटो) Updated: Aug 11, 2018, 11:34 PM न्यूयॉर्क:  मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी (एमआईटी) के अनुसंधानकर्ताओं ने कैंसर के इलाज के लिए मशीन लर्निग की एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे घातक मस्तिष्क कैंसर के लिए कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है. अनुसंधानकर्ताओं में एक भारतवंशी भी शामिल है. ग्लियोब्लास्टोमा एक घातक ट्यूमर है, जो मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी में होता है और इससे पीड़ित मरीज पांच साल से ज्यादा नहीं जी पाते हैं. ऐसे मरीजों को आमतौर पर दवाओं का काफी सुरक्षित खुराक दिया जाता है, फिर भी उनपर दवाओं का दुष्प्रभाव होने का खतरा बना रहता है. लेकिन नई सेल्फ लर्निग मशीन लर्निग तकनीक से दवाओं की खुराक दिए जाने से उसका दुष्प्रभाव कम हो सकता है. अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि परंपरागत उपचार विधि की तुलना में नई उपचार तकनीक में मरीजों को खतरे की आशंका कम रहती है, जबकि फायदा अधिक होता है. अमेरिका के बोस्टन स्थित एमआईटी के प्रमुख अनुसंधानकर्ता पारीख शाह ने कहा, "हमारा लक्ष्य मरीजों के ट्यूमर के आकार क...

अमेरिकी अदालत ने माना कि जॉनसन बेबी पाउडर से होता है कैंसर, कंपनी पर लगा अरबों डॉलर का जुर्माना

नई दिल्ली:  ज्यादातर लोग अपनी जरूरतों को लेकर लापरवाह होते हैं, लेकिन बच्चों के मामले में कोई समझौता नहीं करते. बच्चों को बढ़िया से बढ़िया चीज देना चाहते हैं. ऐसे में नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए सबसे पहले जो ब्रांड दिमाग में आता है वो है जॉनसन एंड जॉनसन. लेकिन इस कंपनी के बेबी पाउडर की वजह से कैंसर होने की बात सामने आई है. अमेरिका में सेंट लुई की अदालत ने पाया है कि जॉनसन कंपनी के बेबी पाउडर की वजह से गर्भाशय का कैंसर हो सकता है. साथ ही अदालत ने कंपनी पर 4.69 अरब डॉलर या करीब 32,000 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. दूसरी ओर जॉनसन एंड जॉनसन ने कहा है कि उसके पाउडर में एस्बेस्टस या कैंसर पैदा करने वाले तत्व नहीं हैं और वो फैसले के खिलाफ अपील करेगी. कंपनी ने कहा है कि उसका पाउडर सुरक्षित है और पहले भी इस प्रकार के निर्णयों को उच्च अदालतों ने तकनीकी व कानूनी आधारों पर बदला है. इस मामले में 22 पीड़ित महिलाओं का आरोप था कि जॉनसन बेबी पाउडर में मौजूद एसबेस्टस की वजह से उन्हें गर्भाशय का कैंसर हुआ. इन महिलाओं ने कहा कि कंपनी लोगों को यह चेतावनी देने में विफल रही कि उसके बेबी पाउडर में खतरना...

हैंड वॉश और टूथपेस्ट से भी होता है कैंसर! आपके लिए जानना है जरूरी

वॉशिंगटन:  हैंड वॉश और टूथपेस्ट में पाए जाने वाले जीवाणुरोधी संघटक ट्राइक्लोजन से गट बैक्टीरिया (अंतड़ियों में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव) बदल सकते हैं जिनसे  मलाशय के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है.  ‘साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया कि चूहों पर किए गए प्रयोग में उनमें ट्राइक्लोजन से मलाशय में जलन हुई और उससे जुड़े कैंसर की रफ्तार बढ़ गई. अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ मेसाचुसेट्स अम्हर्स्ट के गुओदांग झांग ने कहा, ‘‘इन नतीजों से पहली बार पता चला कि ट्राइक्लोजन से हमारी अंतड़ियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. शोधकर्ताओं ने कहा कि जीवाणुरोधी संघटक के रूप में ट्राइक्लोजन का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है और यह 2,000 से ज्यादा उपभोक्ता उत्पादों में पाया जाता है.  चाय पीने से कम होता है कैंसर का खतरा अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में किए गए शोध के अनुसार चाय खासकर काली और हरी चाय पीने से कैंसर का खतरा कम हो जाता है क्योंकि इनमें ‘एंटी-आक्सीडेंट’ तत्व मौजूद होते हैं. विस्कोनसिन विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता हसन मुख्तार ने कहा था कि दुनिया भर में चाय एक लोकप्रिय ...