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भारत में 89% लोग तनाव का शिकार, वैश्विक औसत 86 फीसद

नई दिल्‍ली:  'इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है.' शहरयार ने करीब 40 बरस पहले महानगरीय जीवन की भागदौड़ पर यह सवाल पूछा था, लेकिन आज आलम यह है कि बात शहर से बढ़कर देश तक पहुंच गई है. एक हालिया सर्वे की मानें तो भारत में 89 प्रतिशत लोग तनाव का शिकार हैं, जबकि वैश्विक औसत 86 प्रतिशत है. सर्वे में शामिल लोगों में से हर आठ तनावग्रस्त लोगों में से एक व्यक्ति को इन परेशानियों से निकलने में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. लोग कई कारणों से अपनी इस समस्या का इलाज नहीं करा पाते. इनमें सबसे बड़ी समस्या इसके इलाज पर आने वाले खर्च की है. यह सर्वे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, चीन, ब्राजील और इंडोनेशिया सहित 23 देशों में किया गया और इसके नतीजे भारत के लिए चिंता की बात हो सकते हैं क्योंकि दुनिया के इन तमाम देशों के मुकाबले भारत के लोग कहीं ज्यादा तनाव का सामना कर रहे हैं. सिग्ना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस ने अपने सिग्ना '360 डिग्री वेल-बीइंग सर्वेक्षण-फ्यूचर एश्योर्ड' की एक रिपोर्ट जारी की है. विकसित और कई उभरते देशों की तुलना में भारत में तनाव का स्तर बड़े रूप में है. इस ...

डिप्रेशन से जूझ रहे लोग अच्छी खबर से भागते हैं दूर, जानिए क्या है वजह

लंदन:  एक नए शोध में खुलासा हुआ है कि  तनाव  अथवा उद्वग्निता से जूझने के दौरान लोग बुरी अथवा नकारात्मक खबरों को ज्यादा सहजता से लेते हैं. जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस में प्रकाशित एक शोध में खुलासा किया गया है कि बुरी खबर की बजाय अच्छी खबर को ज्यादा तवज्जो देने की प्रवृत्ति उस वक्त गायब हो जाती है जब लोग डरे हुए होते हैं. ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के ताली शरोट ने कहा, ‘‘आमतौर पर लोग ज्यादा आशावादी होते हैं. हम बुरे को नजरअंदाज करके अच्छे को अपना लेते हैं. हमारे शोध में हिस्सा लेने वाले जब शांत थे तो उन्होंने ठीक यही किया लेकिन जब वे तनाव में थे तो एक नया पैटर्न सामने आया’’. शरोट ने कहा, ‘‘ इन स्थितियों में वे उन बुरी खबरों के प्रति ज्यादा सजग हो गए जो हमने उन्हें दी हालांकि इस बुरी खबर का उनकी उद्विग्नता से कोई संबंध नहीं था. शोध में हिस्सा ले रहे 35 लोगों से कहा गया कि एक कार्य पूरा करने के बाद उन्हें जजों के एक पैनल के सामने अचानक दिए गए किसी विषय पर बोलना होगा. इससे उनमें तनाव का स्तर बढ़ाया गया. वहीं आधे लोगों से कहा गया कि उन्हें अध्ययन के अंत में निबंध लिखना होगा. इसके बाद भाषण द...

12 साल की उम्र में सुसाइड करना चाहती थी बहन, आलिया ने किया दिल को छू लेने वाला ट्वीट

मुम्बई:  बॉलीवुड क्वीन आलिया भट्ट जो आजकल रणबीर कपूर के साथ अफेयर को लेकर चर्चा में छाई में हुई हैं. लेकिन आज जो हम आपको बात बताने जा रहे है. वह उनकी बड़ी बहन शाहीन को लेकर है. आपको बता दें कि शाहीन बॉलीवुड के दिग्गज डायरेक्टर महेश भट्ट की दूसरी पत्नी सोनी राज़दान से बड़ी बेटी हैं. आलिया ने अपने बड़ी बहन शाहीन को लेकर इमोशनल ट्वीट किया है. इस ट्वीट के साथ आलिया ने एक आर्टिकल शेयर किया है. जिसे शाहीन ने एक पत्रिका के लिखा है. आलिया इस लिंक को शेयर करते हुए यह लिखा है 'मेरी बहन शाहीन तुम बहुत बहादुर हो जिसके कारण तुम 12 वर्ष की उम्र से डिप्रेशन से लड़ाई लड़ी. वह अपने दिल से बात करती है और बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी अपनी समस्याओं पर बात करती हैं.'   Alia Bhatt  ✔ @aliaa08 Shaheen you are brilliant! My sister has battled and lived with depression since she was 12. She speaks her heart out and without any hesitation addresses the giant elephant in the room - Mental health and the LACK of our understanding & acceptance! https://www. vogue.in/content/shahee n-bhatt-on-her-battle-w...

सोशल मीडिया की वजह से लोग हो रहे बीमार, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान

सोशल मीडिया पर सकारात्मक बातचीत की तुलना में नकारात्मक अनुभव ज्यादा असर डालते हैं. इन नकारात्मक अनुभवों से युवाओं में अवसाद वाले लक्षणों की संभावना बन जाती है. न्यूयॉर्क:   सोशल मीडिया पर सकारात्मक बातचीत  की तुलना में नकारात्मक अनुभव ज्यादा असर डालते हैं. इन नकारात्मक अनुभवों से युवाओं में अवसाद वाले लक्षणों की संभावना बन जाती है. शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया के नकारात्मक अनुभव अवसाद वाले लक्षणों से जुड़े हैं.  निष्कर्षो का प्रकाशन पत्रिका 'डिप्रेशन एंड एंजाइटी' में किया गया है. अमेरिका के पीट्सबर्ग विश्वविद्यालय के ब्रायन प्रिमैक ने कहा, "हमने पाया है कि सोशल मीडिया के सकारात्मक अनुभव, बहुत आंशिक रूप से कम अवसाद वाले लक्षणों से जुड़े हैं. लेकिन नकारात्मक अनुभव मजबूती से या लगातार उच्च अवसाद के लक्षणों से जुड़े हैं. "इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने 1,179 पूर्णकालिक छात्रों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल व अनुभव का सर्वेक्षण किया. इनकी आयु 18 से 30 के बीच रही. प्रतिभागियों ने अवसाद वाले लक्षणों के आकलन के लिए एक प्रश्नावली भी भरी. शोधकर्ताओं ने पाया कि सोशल मीडिय...