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निमोनिया ले सकता है भारत में 17 लाख से अधिक बच्चों की जान: रिपोर्ट

दुनियाभर में निमोनिया बच्चों के लिए सबसे बड़ी जानलेवा संक्रामक बीमारी है. लंदन:  एक वैश्विक अध्ययन में चेतावनी दी गयी है कि आसानी से उपचार किये जाने योग्य बीमारी   निमोनिया  से भारत में 2030 तक 17 लाख से अधिक बच्चों के मरने की की आशंका है. सोमवार को विश्व निमोनिया दिवस के मौके पर जारी इस अध्ययन में पाया गया है कि इस संक्रामक बीमारी के चलते 2030 तक पांच साल से कम उम्र के 1.1 करोड़ बच्चों की मौत होने की आंशका है. ब्रिटेन स्थित गैर सरकारी संगठन ‘ सेव द चिल्ड्रन’ की यह रिपोर्ट कहती है कि इस रोग के चलते सबसे अधिक मौतें नाइजीरिया, भारत, पाकिस्तान और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में हो सकती हैं. रिपोर्ट के अनुसार इनमें से एक तिहाई यानी 40 लाख से अधिक मौतें टीकाकरण, उपचार और पोषण की दरों में सुधार के ठोस कदम से आसानी से टाली जा सकती हैं. दुनियाभर में यह बच्चों के लिए सबसे बड़ी जानलेवा संक्रामक बीमारी है. मलेरिया, दस्त एवं खसरा को मिलाकर जितनी मौतों होती हैं, उससे कहीं ज्यादा अकेले इस बीमारी से मौतें होती हैं. वर्ष 2016 में 880,000 बच्चों की इस बीमारी से जान चली गयी. प्रतीकात्मक फोटो उनमें से ज्य...

शराब पीने का कोई सुरक्षित स्तर नहीं है : अध्ययन

वाशिंगटन:  मदिरापान का कोई सुरक्षित स्तर नहीं होता है..जी हां वर्ष 2016 में दुनियाभर में शराब पीने से करीब 30 लाख लोगों की मौत होने का दावा करने वाले एक नए अध्ययन में यह पाया गया है. पत्रिका ‘लान्सेट’ में प्रकाशित अध्ययन में 195 देशों और क्षेत्रों में शराब के उपयोग और उससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर का आकलन किया गया. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन से एम्मेनुएला गाकीदोऊ ने कहा, ‘‘शराब से स्वास्थ्य को बड़ा खतरा है.’’ गाकीदोऊ ने कहा, ‘‘हमारे निष्कर्ष हाल ही में हुए अन्य अध्ययनों के अनुरूप हैं, जिनमें मदिरापान और असामयिक मृत्यु, कैंसर तथा हृदय रोगों में स्पष्ट एवं ठोस संबंध पाए गए हैं.’’ कई वर्षों से विशेषज्ञ कहते आए हैं कि थोड़ा-बहुत (प्रतिदिन महिलाओं के लिए एक पेग और पुरुषों के लिए दो पेग) शराब पीना संभवत: समग्र स्वास्थ्य के लिए बुरा नहीं होता. गाकीदोऊ ने कहा, ‘‘बिल्कुल शराब ना पीने से समग्र स्वास्थ्य पर उत्पन्न खतरा कम हो सकता है.’’ अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2016 में दुनियाभर में करीब 30 लाख लोगों की जान शराब पीने से हुई. इनमें से 12 प्रतिशत पुरुष थे जो 15 से 49 वर्ष की आयु के थे...

मत्था देखकर पता चल जाएगा हार्ट अटैक का रिस्क है या नहीं

नई दिल्ली:  अगर किसी इंसान के माथे पर उनके उम्र के अनुपात में समय से पहले गहरी झुर्रियां हैं, तो उन्हें दिल की बीमारी होने का खतरा है. हाल में हुए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है. फ्रांस के हॉस्पिटैलियर यूनिवर्सिटायर डे टॉउलाउज के एसोसिएट प्रोफेसर योलांडे एस्क्यूरॉल ने कहा कि हमने इस शोध में झुर्रियां को इस तरह के जोखिम होने का सिम्बल बनाया, क्योंकि इस पर किसी की भी आसानी से नजर चली जाती है. महज किसी भी इंसान के चेहरे को देखकर इस जोखिम का अंदाजा लगाया जा सकता है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जीवनशैली में सुधार और इलाज होने पर इस जोखिम को कम किया जा सकता है. उन्होंने इससे बचने के सलाह के रूप में कहा कि इंसान को अपनी जीवनशैली और स्वस्थ भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए. अधिक जोखिम वाले इंसान में पहले ही इसकी पहचान कर लेने से इससे बचा जा सकता है. एस्क्यूरॉल कहते हैं कि निश्चित रूप से अगर आपमें इस तरह का जोखिम है तो आप ब्लड प्रेशर और ब्लड ग्लूकोज की जांच कराएं. लेकिन आपको जीवनशैली से जुड़े कुछ बातों पर भी गौर करना होगा. चार आयुवर्ग के लोग शामिल हुए वैसे तो बढ़ती उम्र के साथ हार्ट संबंधी ब...

अगर आप रातों रात चेहरे को चमका देने वाले वीडियो देख रहे हैं तो हो जाएं चौकन्ने!

वॉशिंगटन:  चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी की प्रक्रिया के  यू-ट्यूब वीडियो  के आकलन के लिये किये गए पहले अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि इनमें से अधिकतर भ्रामक विपणन अभियान के तहत गैर-योग्यताप्राप्त चिकित्सा पेशेवरों के द्वारा पोस्ट किये गए हैं. अमेरिका की रटगर्ज यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर बोरिस पासखोवर इस अध्ययन के प्रमुख थे. उन्होंने कहा कि लाखों लोग जो चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी पर जानकारी के लिये यू-ट्यूब का रूख करते हैं उन्हें गलत जानकारी मिलती है जिसमें इससे जुड़े जोखिमों या दूसरे विकल्पों की जानकारी नहीं होती. पासखोवर ने कहा, ‘‘चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी को लेकर वीडियो मुख्य रूप से विपणन अभियान हो सकते हैं और हो सकता है उनकी मंशा पूरी तरह शिक्षित करने वाली न हो।’’ शोधकर्ताओं ने सबसे ज्यादा देखे गए 240 वीडियो का अध्ययन किया जिन्हें कुल मिलाकर 16 करोड़ बार देखा गया था. ये वीडियो ‘‘ब्लेफारोप्लास्टी’’, ‘‘आईलिड सर्जरी’’, ‘‘डर्मल फिलर्स’’, ‘‘फेसियल फिलर्स’’, ‘‘ओटोप्लास्टी’’, ‘‘इयर सर्जरी’’, ‘‘फेसलिफ्ट’’, ‘‘लिप अगमेंटेशन’’, ‘‘नोज जॉब’’ आदि ‘कीवर्ड सर्च’ से मिलते हैं. अध्ययनकर्ताओं ने ...

इन देशों में धड़ल्ले से बिक रही हैं नकली और खराब गुणवत्ता वाली दवाएं

वॉशिंगटन:  वैज्ञानिकों का कहना है कि मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारी सहित दूसरी बीमारियों की नकली और खराब गुणवत्ता वाली दवाएं विकासशील देशों में धड़ल्ले से इस्तेमाल की जा रही हैं. वैज्ञानिकों ने साथ ही कहा कि कम एवं मध्यम आय वाले देशों से नमूने के तौर पर ली गयी दवाओं में से 13 प्रतिशत दवाएं खराब गुणवत्ता की थीं. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना (यूएनसी) के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पता चला कि अफ्रीका में इस्तेमाल में लायी जा रही 19 प्रतिशत जरूरी दवाएं नकली या खराब गुणवत्ता की थीं. शोधकर्ताओं ने पाया कि कम और मध्यम आय वाले देशों में 19 प्रतिशत मलेरिया रोधी और 12 प्रतिशत एंटीबॉयोटिक दवाएं नकली या खराब गुणवत्ता की थीं. यूएनसी में सहायक प्रोफेसर साचिको ओजावा ने कहा, ‘‘खराब गुणवत्ता वाली या नकली दवाओं का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या है क्योंकि ये दवाएं अप्रभावी या नुकसानदेह हो सकती हैं और बीमारी को लंबे समय के लिए खींच सकती है, विषाक्तता को जन्म दे सकती है या शरीर पर खतरनाक नकारात्मक असर डाल सकती हैं. ’’ यूएनसी के प्रोफेसर जेम्स हेरिंगटन ने कहा, ‘‘हमें दवाओं की ...