आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। भगवान को प्रसन्न करना। इसमें परमात्मा में लीन होकर भक्त अपने देव की सारी बलाए स्वयं पर ले लेता है और भगवान को स्वतन्त्र होने का अहसास कराता है। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। आरती पूरे घर को प्रकाशमान कर देती है, जिससे कई नकारात्मक शक्तियां घर से दूर हो जाती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं। श्री हनुमानजी की आरती आरति कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।। जाके बल से गिरिवर कांपै । रोग-दोष जाके निकट न झांपै ।। अंजनी पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रेम सदा सहाई ।। दे बीरा रघुनाथ पठाये । लंका जारि सिया सुधि लाये ।। लंका सो कोट समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई।। लंका जारि असुर संहारे। सिया रामजी के काज संवारे ।। लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे । आनि सजीवन प्रान उबारे ।। पैठि पताल तोरि ज...
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