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BJP ही नहीं मुलायम भी हैं महागठबंधन से परेशान! चाहते हैं फिर एक हों अखिलेश और शिवपाल










दीपावली के दिन ही मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश को आशीर्वाद दिया था तो थोड़ी देर में ही भाई शिवपाल को भी गले लगाकर बधाई देने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के दफ्तर पहुंच गये. इससे एक सप्ताह पहले भी नेताजी पहले शिवपाल की पार्टी दफ्तर पहुंचे. मंच पर शिवपाल यादव के साथ बैठे और वहां से निकल कर समाजवादी पार्टी के दफ्तर पहुंच गये. यहां पर अखिलेश के साथ मंच साक्षा किया. इतना ही नहीं इन दिनों में मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश और शिवपाल को लेकर कोई भी बयान नहीं दिया है.

अलग पार्टी बनाकर भतीजे अखिलेश यादव से डीलिंग के लिए शिवपाल यादव ने बढ़ाया हाथ



इसलिए चाहते हैं मुलायम परिवार में न हो फूट...
इसके पीछे वजह भी है. दरअसल, यूपी में एसपी-बीएसपी के बीच गठबंधन की जो धुंधली सी तस्वीर सामने आई है उसने मुलायम को कुछ ज्यादा ही परेशान कर दिया है. नेताजी को लगता है कि एसपी-बीएसपी के गठबंधन के बाद समाजवादी पार्टी से जिन बड़े नेताओं को टिकट कटेगा, वो विकल्प के तौर पर सीधे शिवपाल के साथ जुड़ेंगे. शिवपाल की नजर भी ऐसे नेताओं पर ही है और कुछ ऐसे नेताओं का शिवपाल के प्रगतिशील समाजवादी पार्टी से जुड़ने का सिलसिला भी शुरू हो चुका.

इशारों-इशारों में मुलायम ने कहा- 'शिवपाल के साथ अन्याय हुआ है'

शिवपाल के मजबूत होने का मतलब अखिलेश का कमजोर होना है, या फिर यू कहें कि जो लोग अखिलेश से नाराज होगें वो शिवपाल के साथ ही जाएंगे. ऐसे में समाजवादी पार्टी का कमजोर होना तय है. वैसे भी दोनों का वोट बैंक एक ही है. अखिलेश का पास युवाओं की ताकत है तो शिवपाल सिंह यादव को संगठन का नेता माना जाता है. ऐसे में समाजावादी पार्टी को कमजोर होने से बचाने की जिम्मेदारी मुलायम सिंह यादव ने उठाई है.

राजनीति के जानकार भी मानते हैं कि शिवपाल के खड़ा होने का मतलब अखिलेश का लड़खड़ाना होगा. अलग पार्टी बनाने के बावजूद वो समाजवादी पार्टी के विधायक हैं और  पार्टी उन्हें निकाल नहीं रही है. ये जरूर है कि अखिलेश उन्हें परोक्ष रूप से बीजेपी का बी टीम करार दे रहे हैं. हालांकि, शिवपाल ने अपनी राहें जुदा करने के साथ ही यह साफ कर दिया है कि समान विचारधारा के साथ जुड़ने में कोई बुराई नहीं. तो क्या समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ेंगे?

Shivpal and Mulayam

दरअसल, शिवपाल कहते हैं कि पार्टी में उन्हें वो सम्मान नहीं मिला जिसका वो हकदार हैं. तो क्या सम्मान मिलने पर समझौता होगा? शिवपाल अभी ऐसे सवालों से बच रहे हैं. हां, इतना जरूर कहते हैं कि प्रगतिशिल समाजवादी पार्टी का गठन बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक पार्टियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए ही हुआ है. ऐसे में सवाल है कि क्या मुलायम सिंह की कोशिशें रंग ला पाएंगी. क्या दिलों की दुरियां मिट पाएंगी? जानकार मानते हैं कि मुलायम की चाल को कोई भी समझ नहीं पाया है. समाजवाद के झंडाबरदारों को लगता है कि कोई करिश्मा जरूर होगा. लेकिन, ये करिश्मा होगा भी या नहीं या फिर कब होगा इसके लिए थोड़ा इंतजार करना हेगा.





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