राजस्थान स्थित झुंझुनूं के कोदेसर निवासी और मुंबई प्रवासी इंद्राज चौधरी उनके घर में 50 साल बाद बेटी जन्म हुआ है. इससे परिवार में खुशी का माहौल है. इंद्राज चौधरी बताते है कि 50 साल पहले उनकी सबसे छोटी बहन संतोष घर में जन्म ली थी. लेकिन उस वक्त बेटी जन्म पर ना तो खुशी मनाई जाती थी और ही कुआं पूजन व अन्य कार्यक्रम होते थे. लेकिन बेटी घर की रौनक होती है. जब 50 साल बाद परिवार को यह खुशी मिली है तो हर कोई इस खास मौके को बेहद खास बनाने में चूकना नहीं चाहता.
इंद्राज चौधरी के समधी नवाचार करने वाले शिक्षाविद् और प्रतापपुरा स्कूल के प्रिंसीपल कमलेश तेतरवाल है. इंद्राज चौधरी ने जब बेटी जन्म पर वो सारे कार्यक्रम करने की सोची, जो बेटे के जन्म पर होते है. तो उन्होंने कमलेश तेतरवाल से चर्चा की. कमलेश तेतरवाल भी मानों इसके लिए पहले से प्लानिंग किए ही बैठे थे. उन्होंने हामी भरी और फिर बेटी के जन्म पर ऐसी ग्रांड पार्टी करने की सोच ली कि पूरे गांव को प्रीतिभोज पर बुलाया गया तो वहीं प्रसूता डॉ. नेहा को बग्घी पर बैठाकर पूरे गांव में घुमाया गया.
उन्होंने सभी रीति रिवाजों के साथ बेटी के जन्मोत्सव को मनाया. वहीं, बच्चे से लेकर बुजूर्ग तक हर किसी ने डीजे की धुन पर ठुमके भी लगाए. जिसमें महिलाएं भी पीछे नहीं थी. इस मौके पर कमलेश तेतरवाल व उनकी पत्नी राजश्री तेतरवाल ने अपनी ओर से कोदेसर की सरकारी स्कूल की बेटियों को 10 सालों तक अपनी दोहिती के नाम से पुरस्कार देने की घोषणा भी की.
आपको बता दें कि कमलेश-राजश्री तेतरवाल ने अपने बेटे की शादी भी बिना दहेज लिए की थी. जबकि अपनी बहू को मुंह दिखाई में कार देकर एक अनूठा उदाहरण पेश किया था.
पहले जहां बेटी के जन्म पर प्रसूता का घृणा की नजर से देखा जाता था और प्रसूता भी परिवार के कोप का शिकार होती थी. वहीं, अब समय बदल गया है. डॉ. नेहा को जितनी खुशी हुई. उससे कहीं ज्यादा परिवार ने खुशियां मनाई. डॉ. नेहा को बेटी का सुख देने परिवार ने इतना लाड चाव किया कि उसको महारानी की तरह बग्घी पर बैठाया और पूरे गांव में घुमाकर संदेश दिया कि बेटा-बेटी एक समान हैं.
वैसे तो बीते सालों में झुंझुनूं ने बेटी बचाओ बेटी पढाओ में कई नवाचार कर पूरे देश को संदेश दिया. इस तरह गांव-गांव में बदली सोच के कारण ही आज झुंझुनूं का लिंगानुपात भी सुधरा है तो बेटी के जन्म पर लोगों की धारणा भी बदली है. जिन बुजूर्गों ने बेटी के जन्म पर गाहे बगाहे में कभी प्रसूताओं को ताने सुनाए होंगे. वे भी आज बदली सोच के साथ कदमताल बढ़ा रहे है. कई जगहों पर ऐसे बुजूर्ग भी सामने आते है. जो बेटी के जन्म पर ताने नहीं, बल्कि उसकी तान पर थिरकते है.
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