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हरियाणा: बीजेपी के बागी 'राजकुमार' कुरुक्षेत्र की जंग में किसके सिर पर बांधेंगे जीत का सेहरा

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में कुरुक्षेत्र का खास महत्व है. सत्ता की महाभारत का रास्ता कुरुक्षेत्र से होकर न गुजरे, ये हो नहीं सकता. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कुरुक्षेत्र के बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस के कद्दावर नेता नवीन जिंदल को हराकर कुरुक्षेत्र जीतने वाले राजकुमार सैनी ने रविवार को लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के नाम से एक नया दल बनाने का ऐलान किया और रविवार को ही एक बड़ी रैली का आयोजन अपनी ताकत का ऐहसास भी कराया.

ऐसे में सवाल ये है कि बीजेपी के ये बागी सांसद आखिर नुकसान किसे पहुंचाने जा रहे हैं. बीजेपी को या कांग्रेस को. ये भी गौरतलब है कि अलग पार्टी बनाने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हरिणाया के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर, दोनों ही उनके सीधे निशाने पर नहीं हैं. वो एक बार फिर अपने चिर-परिचित राजनीतिक प्रतिद्वंदी - जाटों को ही निशाना बना रहे हैं. यही वो मुद्दा है, जिसे लेकर उन्होंने बीजेपी की मुखालफत की है. हरिणाया की राजनीति में लगभग दस प्रतिशत मत प्रतिशत वाले जाटों का दबदबा रहा है. दो दशक से हरियाणा में जाट मुख्यमंत्री ही रहा है. ऐसे में जब बीजेपी सत्ता में आई तो उनसे गैर-जाट को मुख्यमंत्री बनाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. यानी कहीं न कहीं मकसद जाटों के वर्चस्व को तोड़ना और गैर-जाट वोटर को रिझाना रहा होगा. लेकिन अब इसी मुद्दे पर राजकुमार सैनी अधिक मुखर होकर अपनी बात रखेंगे, तो क्या वो बीजेपी से सत्ता समीकरण को हिला सकते हैं.

बीजेपी की परेशानी 
बीजेपी भी घर में हुई इस बगावत को लेकर परेशान है. पार्टी की परेशानी राजकुमार सैनी के जनाधार को लेकर उतनी नहीं है, जितना कि उस मुद्दे से है, जिसे लेकर सैनी आगे बढ़ रहे हैं. पार्टी को डर है कि ये चिंगारी कहीं आग न बन जाए. यही वजह है कि पार्टी ने लंबे समय तक सैनी के बगावती तेवर को नजरअंदाज किया और उनके द्वारा अलग पार्टी बना लेने पर भी पार्टी की तरफ से फिलहाल कोई बहुत कड़ी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

हरियाणा की राजनीति में जाट और गैर-जाट के बीच हो रहे बंटवारे में बीजेपी गैर-जाट वोटरों को अपने पक्ष में करना तो चाहती है, लेकिन खामोशी के साथ. वो ये नहीं चाहती कि गैर-जाट राजनीति इतनी मुखर हो जाए कि जाटों का पूरी तरह दूसरी तरफ ध्रुवीकरण हो जाए. जाट वोट प्रतिशत के लिहाज से भले कम हों, लेकिन हरियाणा में प्रभावशाली हैसियत रखते हैं. उनके खिलाफ ध्रुवीकरण करके सत्ता नहीं पाई जा सकती. यही बीजेपी की मुश्किल है. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के हुड्डा और इनेलो के चौटाला, दोनों जाट ही हैं.

बीजेपी की उम्मीद 
बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में हुड्डा और चौटाला की गुंडई को मुद्दा बनाया था, लेकिन साथ ही जाटों में प्रभावशाली माने जाने वाले मलिक जाट के प्रधान दादा बलजीत मलिक को अपने पाले में लाकर जाट वोट पाने में कामयाबी पाई थी. लेकिन इसके बाद गैर-जाट को मुख्यमंत्री बनाने पर जाटों ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया. ऐसे में अगर राजकुमार सैनी जाट और गैर-जाट की राजनीति को हवा देते हैं, तो ये हवा किसे नुकसान किसे नुकसान पहुंचाएगी ये कहना अभी जल्दबाजी होगा.

पिछले लोकसभा चुनाव में हरियाणा की कुल 10 सीटों में से बीजेपी को सात पर जीत मिली थी. इसमें से छह सांसद गैर-जाट थे और सिर्फ एक जाट सांसद बीजेपी के टिकट से जीता था. जाहिर तौर पर बीजेपी ने गैर-जाट वोटरों पर ही दाव लगाया था. अब अगर राजकुमार सैनी बीजेपी से अलग होने के बाद इस ध्रुवीकरण को और तेज करते हैं, तो इसका फायदा तो बीजेपी को ही मिलेगा और वो राजकुमार सैनी के कंधे पर बंदूक रखकर आसानी से गोली दाग सकती है. ऐसे में बीजेपी पर गैर-जाट की राजनीति करने का आरोप नहीं लगेगा, क्योंकि ये काम तो उसकी तरफ से सैनी करेंगे. इस तरह जाट बीजेपी से पूरी तरह नाराज नहीं होंगे और बीजेपी उन्हें भी साध लेगी. हमने गुजरात चुनाव के दौरान ऐसा ही देखा था, जब हार्दिक पटेल ने पटेल और गैर-पटेल का ध्रुवीकरण तैयार किया. ऐसे में गैर-पटेल बीजेपी के साथ आ गए और बीजेपी ने पटेलों को भी काफी हद तक साधा लिया. हालांकि अभी इस बारे में निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगा, लेकिन हो सकता है कि चुनाव परिणाम आने के दिन राजकुमार सैनी बीजेपी के ही सेनानी साबित हों.

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