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कभी पूरा होगा अटल जी का यह अधूरा सपना...

नई दिल्‍ली: दिनांक 2 अप्रैल 1998. तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयीराज्‍यसभा में राष्‍ट्रपति के अभिभाषण का जवाब दे रहे थे. अटल जी का भाषण तमाम मुद्दों से गुजरता हुआ राज्‍यसभा सांसद शबाना आजमी द्वारा सदन में व्‍यक्‍त की गई पीड़ा तक पहुंच चुका था. दरअसल, एक दिन पहले ही शबाना आजमी ने अपने भाषण में दुख जताते हुए कहा था कि "यहां जब और बातें की जाती हैं तब तो तालियां बजती हैं, लेकिन राष्‍ट्रपति के अभिभाषण में सबको मकान देने की बात आई, तब किसी ने ताली नहीं बजाई.” अटल जी ने भाषण के दौरान शबाना की इस पीड़ा पर अपने शब्‍दों का मरहम लगाया, फिर उन्‍होंने अपने उस सपने का जिक्र किया, जिसमें हर गरीब को उसका अपना घर मुहैया कराने की बात समायोजित थी.

एक प्रयोग से सच हो सकता है गरीबों के अपने घर का सपना
अटल जी ने अपने भाषण में कहा कि शबाना आजमी के बिंदु में अनगिनत संभावनाएं हैं. अगर लाखों मकान बनने शुरू हो जाते हैं तो सरकार न केवल मदद करेगी, बल्कि जमीन भी उपलब्‍ध कराएगी. उन्‍होंने कहा कि शहरों  के आसपास गांव में जमीन  बेकार पड़ी है, उन पर जबरदस्ती लाठी के बल पर कब्जा किए जा रहे हैं. कब्‍जा की गई सार्वजनिक जमीन पर गगनचुंबी अट्टालिकाएं (बहुमंजिला इमारत) खड़ी की जा रही है. वहीं कई जगहों पर गगनचुंबी अट्टालिकाएं (बहुमंजिला इमारत) बनाने के लिए सस्‍ती दरों पर तो कई जगहों पर निःशुल्क जमीनें उपलब्ध कराई जा रही हैं. अगर, हम इस योजना में व्यक्तिगत पूंजी को प्रोत्साहित कर लोकप्रियता के आधार पर लोगों को शामिल करें तो गरीबों को उनका मकान दिलाने की तरफ देखे गए एक बड़े सपने को साकार किया जा सकता है.

बड़ा प्रयोग करने के लिए हमें खतरा तो मोल लेना ही पड़ेगा

अटल जी ने कहा कि इस योजना के जरिए लखनऊ में 5 रुपए रोज जमा करके एक व्यक्ति 10 से 15 वर्ष की अवधि में एक छोटा सा मकान हासिल करने में सफल हो सकता है. यह कठिन और बड़ा प्रयोग है, लेकिन प्रयोग तो हमें करने पड़ेंगे और खतरा तो मोल लेना ही पड़ेगा. उन्‍होंने कहा कि यह मकान सिर्फ एक मकान नहीं होगा, घर होगा. वहां विद्यालय होगा, वहां चिकित्सा सुविधाएं होंगी और वहां खेल-कूद का मैदान भी होगा. लखनऊ के आसपास हजारों एकड़ जमीन पड़ी है. मैं देख रहा हूं कि वह धीरे-धीरे सिकुड़ती जा रही है, संकुचित होती जा रही हैं. भूमि के दादा लठ के बल पर और राजनीतिक प्रभाव के आधार पर उस जमीन पर कब्जा कर रहे हैं. खाली पड़ी इन जमीनों को भूमि के दादाओं से सुरक्षित करना होगा.

बड़े विचार के लिए छोटे विचार से कहना होगा आरंभ
अपने भाषण में अटल जी ने कहा कि यह सारी जमीन अलग की जानी चाहिए, कब्‍जे से इस जमीन को बचाया जाना चाहिए. जो लोग झुग्गी झोपड़ियों में रहते हैं, नालों के किनारे पड़े रहते हैं, जिनके लिए जिंदगी नरक बन गई है, उनके लिए आशा की कोई तो किरण कहीं ना कहीं से चमकनी चाहिए. मैं मानता हूं कि यह एक छोटा सा विचार है, लेकिन बड़े विचार के लिए छोटे विचार से कहीं ना कहीं तो आरंभ करना पड़ेगा.

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